उत्तराखंड: रैणी और तपोवन में एक घंटे तक नाचती रही मौत, जो भी सामने आया उसे लील लिया
देहरादून
ऋषिगंगा ग्लेशियर के टूटने से आई बाढ़ पर सवार होकर आई मौत रैणी और तपोवन के बीच करीब एक घंटे तक नाचती रही। पहले ऋषिगंगा और फिर धौली गंगा में उफान मारती लहरों ने किसी को बचने का मौका नहीं दिया। जो भी चपेट में आया, उसे लील लिया। राहत और बचाव कार्य शुरू होने के बाद मलबे से निकल रहे शव बाढ़ की क्रूरता को बयां कर रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं। सुबह के वक्त जिसने भी ऋषिगंगा और धौलीगंगा का विकराल रूप जिसने भी देखा, वह सहम उठा। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में बाढ़ को देखकर चीखते लोगों में लोगों का भय साफ-साफ नजर आ रहा है। ऊंचाई पर खड़े लोगों ने दूर से धौली गंगा को उफनते हुए देख लिया था। तबाही को आते देख लोगों ने चीखते हुए नीचे प्रोजेक्ट में काम कर रहे लोगों को सावधान करने की पूरी कोशिश की।
लोगों ने चीखते चिल्लाते हुए लोगों को ऊपरी इलाकों में आने को कहा। पर बाढ़ की भीषण आवाज और दूरी होने की वजह से उनकी आवाज नीचे तक नहीं पहुंच पाई। प्रोजेक्ट एरिया में मचती तबाही को देखकर कुछ लोग तो बिलख-बिलखकर रोने भी लगे। स्थानीय भाजपा कार्यकर्ता कमलेश मैखुरी ने इस मंजर को फेसबुक पर लाइव भी किया। करीब एक घंटे घंटे तक पूरे क्षेत्र में अफरातफरी और भय का माहौल बना रहा। नदी का पानी सामान्य होने के बाद लोगों ने कुछ राहत की सांस ली। रैणीगांव के सरकारी हाईस्कूल में अंग्रेजी के शिक्षक राजेंद्र सिंह परमार बताते हैं इस घटना के तत्काल बाद में अपने स्कूल की स्थिति देखने रवाना हो गया था। वहां जाकर नजारा देखा तो पैरों तले जमीन ही खिसक गई। बैराज प्रोजेक्ट एरिया पूरी तरह से तबाह हो चुका था। जहां हमेशा बड़ी संख्या में लोग करते रहते थे, वहां बिलकुल वीराना पसरा हुआ है। चारों तरफ बाढ़ के साथ आया मलबा ही मलबा फैला है। स्थानीय ट्रांसपोर्टर पुष्कर सिंह रावत बताते हैं कि बाढ़ की वजह से हुए नुकसान को देखकर दिल भर आता है।
नौ से ज्यादा गांव यातायात से कटे
बाढ़ की वजह से नीति वैली के कई गांव यातायात से कट गए हैं। राजेंद्र सिंह परमार बताते हैं कि रैणी को नीति वैली से जोड़ने वाला एक बड़ा पुल था। आज वो पुल कहीं नजर नहीं आ रहा है। दोनों क्षेत्रों को जोड़ने वाले कई और छोटे पुलों का भी कहीं अता-पता नहीं है। इन पुलों के जरिए नीति वैली के रैणी मल्ली, रैणी पल्ली, पैंण, जुमागाड़, सूखी, सुरईंखेत, भल्गांव, जुगसू, लाता समेत कई गांव जुड़े थे। यहां काफी बड़ी आबादी रहती हैं। पुल टूटने से ये लोग इस क्षेत्र से कट गए हैं।
छुट्टी और दिन का वक्त होने से नुकसान हुआ कम
रविवार की छुट्टी और दिन का वक्त होने की वजह से आपदा का नुकसान काफी कुछ कम रहा। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि यह आपदा रात के वक्त आती तो तबाही और भी भयावह हो सकती थी। मालूम हो कि वर्ष 2013 में केदारनाथधाम की आपदा रात के वक्त आई थी। रात का वक्त होने से लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिल पाया। केदारनाथ आपदा में हजारों लोग मौत का शिकार बने थे।

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